Wednesday, December 14, 2011

अमेरिका की लाजवाब सुरक्षा नीति पर हाय तौबा क्यूं ?


अमेरिकी हवाई अड्डा में ''माई नेम इज, शाहरूख खान`` शाहरूख खान के ये स्टाईलिश बोल सुरक्षा हेतु लगे कम्प्युटर को नागवार गुजरे और कम्प्युटर ने सुरक्षा अधिकरियों को गहन जांच के आदेश दे दियें लगभग दो घंटे तक शाहरूख खान को जांच हेतु रोके रखा बाद में पूरी संतुष्टि पश्चात छोड़ दिया। इस पर भारतीय मीडिया ने खूब हाय तौबा मचाईं शाहरूख खान न हुए भारत के बादशाह हो गये। न्यूज चैनलों ने टी आर पी बढ़ाने को कोई भी मौका हाथ से जाने न दिया। शाहरूख की सुरक्षा जांच को भारत की बेइज्जत्ती के रूप में प्रचारित करना शुरू कर दिया। क्या भारत की इज्जत इतनी सस्ती है कि अभिनेता की सुरक्षा जांच से बेइज्जत हो जाये। जबकि गौरतलब है कि इससे पहले अमेरिका में जसवंत सिंह की जांच के दौरान कपड़े भी उतारे गये तथा कुछ दिन पूर्व पूर्वराष्ट्रपति ए.पी.जे.अब्दुल कलाम को भारत में ही अमेरिकी हवाई कम्पनी के सुरक्षा अधिकारियों ने आम आदमी की भाती रेगुलर जांच की ।तब मीडिया की शायद नींद नही खुली रही होगी। लेकिन बाद में कई बुध्दिजीवियों ने इन समस्त जांच पर खूब कड़ी आलोचना की तथा अमेरिका को जी भरकर कोसा भी। उनका मानना है कि व्ही.आई.पी. की जांच उसकी इज्जत से खिलवाड़ है ये जांच नही होनी चाहिए। अमेरिका बार-बार ऐसा करके हमारी इज्जत से खिलवाड़ कर रहा है भारत को चाहिए की उसका विरोध करें।

दरअसल ऐसा सोचने वाले तथा हाय तौबा मचाने वाले लोग उसी पुरानी मानसिकता वाले लोग हैं जो व्ही.आई.पी. को इन्सान बाकि को जानवर समझते है। व्ही.आई.पी. यानी पैसे वाला या हर वो आदमी जो आम आदमी नही है। भारत में हर व्यक्ति सुरक्षा या अन्य किसी भी प्रकार की जांच से बचना चाहते है। एक अदना सा पुलिस का सिपाही को ही देख लिजिए उसकी छोटी सी मोटर सायकल में लिखा होता है। बड़ा सा ''पुलिस``उद्देश्य एक मात्र सुरक्षा जांच (ट्रफिक जांच भी) से बचनां चाहे पंच हो, सरपंच हो, पार्षद हो, विधायक हो, या सांसद हो सभी की गाड़ी के नेम प्लेट पर ऐसा चिन्ह जरूर होगा। जो सुरक्षा जांच टीम पर भारी पड़ेगां और वह व्यक्ति जांच से बच जायेगा। जांच से बचा यानी इज्जत बच गई। सिर्फ इज्जत बची ही नही बल्कि इज्जत बढ़ भी जाती है ऐसे जांच से बचने से। देखिये कितनी काम की है ये जांच। तभी तो सारे व्ही.आई.पी. जेड सुरक्षा १-४ के गार्ड की सुरक्षा लेने हेतु जुगत लगाते रहेते है चाहे इसके लिए फर्जी फोन का सहारा ही क्यो न लेना पड़ जाये। आज कर इस फेहरिस्त में क्रिकेट खिलाड़ी, अभिनेता भी शामिल हो गये। नेताओं का तो इसमें जन्मजात अधिकार था ही। फिर प्रश्न खड़ा होता है वह नेता नेता ही कैसा जो आम आदमी से असुरक्षित है, वह खिलाड़ी सिर्फ खिलाड़ी तो नही है जिसे सुरक्षा चाहिएं अभिनेता में क्या खोट है जो अपने चाहने वालों से असुरक्षित है।

भारत में बड़ी जबरजस्त परंपरा है जिसकी सुरक्षा में आदमी लगे हो उसकी सुरक्षा जांच नही होती। जब कोई हवाई जहाज से आये तो उसकी जांच नही होती। जब कोई ट्रेन के वातानुकूलित डिब्बे से उतरे तो उसकी जांच नही होती। अगर जांच कि गई तो उस  सुरक्षा अधिकारी की जांच चालू हो सकती है। हो सकता है बाद में उसका स्थानांतरण या निलंबन तक ये जांच चलती रहे। इससे अंदाज लग सकता हे कि कितना निरंकुश है हमारा व्ही.आई.पी. समाज इसी मारसिकता का फायदा आंतक वादियों को मिलता है यही कारण है कि अमेरिका में ९/११/२००१ के बाद एक भी आतंकवादी हमले नही हुए। लेकिन भारत में पूरा कलेण्डर आतंकवादी हमले भरा हुआ है। आखिर क्यूं भारतीय व्ही.आई.पी. सुरक्षा जांच  का सामना करने से कतराता है क्या सिफ अह ंके कारण। कितने ही आतंकवादी भारत में एक व्ही.आई.पी. की तरह प्रवेश हो जाते है। हाल ही में दिल्ली में हुए हमले के सभी आरोपी ट्रेन के वातानुकूलित डिब्बे में सफर करते हुए विस्फोटक सामग्री लेकर आये थे। जो व्ही.आई.पी. सदृश्य होने के कारण जांच से बज गये। बंबई का प्रसिध्द ताज पांच सितारा होटल जिसमें जाने का सपना आम-आदमी देख भी नही सकता। आतंवादी उसमें भी व्ही.आई.पी. बनकर घुस गये। क्योंकि भात में सब कुछ हो सकता है व्ही.आई.पी. की जांच नही हो सकती यह बाद देश के दुश्मन को अच्छि तरह मालुम है। क्योकि इससे व्ही.आई.पी. की इज्जत में बट्टा लग जाता है।

अभि वक्त अमेरिका पर उंगली उठाने का नही हैं। बल्कि उससे सीख लेने का है। यह गहन विचार का बिन्दु है कि टूईन टावर हमले के बाद आज तक अमेरिका में कोई आतंकवादी हमला नही हो सका। उनकी सुरक्षा नीति से हमे सीख लेनी चाहिए। अमेरिका आज विश्व में सर्वश्रेष्ठ है तो हमे भी अपनी आत्ममुग्दधा से बाहर आना चाहिए। उनके सर्वश्रेष्ठता के मापदण्ड को देख कर खुश होना चाहिए। जहां भारत में आम आदमी पर सारे नियम लागु होते है वही व्ही.आई.पी. एवं पुजीपतियों का बोल-बाला बढ़ रहा है। ऐसे में एक सरकारी होहदेदार सरकारी खजाने को चट करने में लगा हुआ। चाहे चारा घोटाला हो या स्टांप घोटाला या हवाला का मामला या फिर सरकारी सम्पतियों का दुरूपयोग का मामला हो। जबकि अमेरिका का राष्ट्रपति को व्हाईट हाउस में रहने एवं अपनी निजी सेवाओं का खर्चा स्वयं वहन करना पड़ता है। अमेरिका में सुरक्षा जांच को महत्व देना प्रतिष्ठित नागरिक गुण माना जाता है। अमेरिका की सुरक्षा नीति ऐसी है जिसमें मंत्री, नेता, अफसर, राष्ट्रपति, सेलिब्रेटी यहां तक की जज भी जांच के दायरे से बाहर नही है। यहां प्रत्येक व्यक्ति को सुरक्षा जांच की कसौटी पर खरा उतरना पड़ता है। ताकि कोई भी आतंकवादी गतिविधीयां न हो सके। ऐसी व्यवस्था से मजाल हे कोई चिड़ीया भी पर मार सके।

अब प्रश्न यह उठता है कि भारत में आतंक वाद तथा नक्सलवाद सिर चढ़ कर बोल रहा है। हमारी सुरक्षा व्यवस्था बेमानी हो रही है जो केवल आम आदमी को परेशान करने का सबब बन गई है। तो क्या भारत अमेरिका के विरोध करने में अपनी शक्ति जाया करेगा या उनकी लाजवाब सुरक्षा नीति से कुछ सीख लेने की चेष्टा भी करेगा।

Tuesday, November 1, 2011

एक किताब जो आज भी प्रासंगिक है।

संस्मरण
           संजीव खुदशाह
सन् १९८३-८४ के आस-पास जब मैं छठवीं क्लास में था। समाज के सक्रीय कार्यकर्ताओं की बैठक में, मै भी शामिल हो जाया करता था। वहीं पर पहली दफा यह तथ्य सामने आया कि हमारे बीच के एक सुप्रीम कोर्ट के जज (वकील है ये जानकारी बाद में हुई) है, जो समाज के लिए भी काम कर रहे है। मुझे इस जज के बारे में और जानने की उत्सुकता हुई, किन्तु ज्यादा जानकारी नही मिल सकी । इस दौरान मैने डा. अम्बेडकर की आत्मकथा पढ़ी। दलित समाज के बारे में और जानने पढ़ने की इच्छा जोर मार रही थी। रिश्ते के मामाजी जो वकालत की पढ़ाई कर रहे थे, मुझे किताबे लाकर देते थे और मै उन्हे पढ़कर वापिस कर देता था । उन्हेाने अमृतलाल नागर की 'नाच्यो बहुत गोपाला` उपन्यास लाकर दी परिक्षाएं नजदीक होने के कारण उसे मै पूरा न पढ़ सका । पढ़ाई को लेकर बहुत टेन्शन रहता था। माता-पिता को मुझसे बड़ी अपेक्षाऐ थी जैसा कि सभी माता-पिता को अपने बच्चों से रहती है। चूंकि मै मेघावी छात्र था इसलिए कक्षा में अपना स्थान बनाए रखने के लिए मुझे काफी मेहनत करनी पड़ती थी। इस समय मेरे मन में समाज के लिए कुछ करने हेतु इच्छा जाग चुकी थी इसलिए कम उम्र का होने पर भी मै सभी सामाजिक गतिविघियों में भाग लेने लगा। इसी दौरान मामाजी ने मुझे यह किताब लाकर दी ''मै भंगी हूं`` इसे मैने दो-तीन दिनों में ही पढ़  डाली। मन झकझोर देनेवाली शैली में लिखी इस किताब ने मुझे बहुत अंदर तक प्रभावित किया। चूंकि मेरी आर्थिक हालत अच्छी नही थी, इसलिए इस किताब को मै खरीद नही पाया। पिताजी की छोटी सी नौकरी के साथ घर का खर्च बड़ी कठिनाई से चल पाता था।
मैं भंगी हूं किताब पढ़ते समय भी मुझे यह जानकारी नही थी। कि ये वही सुप्रीम कोर्ट के जज है, जिनके बारे मे मैने सुना था। बाद में मुझे अन्य बुद्धि जीवियों से मुलाकात के दौरान ज्ञात हुआ कि वे जज नही बल्कि सुप्रीम कोर्ट के वकील है, जिन्होने मै भंगी हूं किताब की रचना की है। मैने एक चिट्ठी एड. भगवानदास जी के नाम लिखी, जिसमें मै भंगी हूं की प्रशंसा की थी।
अत्यधिक सामाजिक गतिविधियों में भाग लेने के कारण तथा चिन्तन के कारण मै स्कूल की पढ़ाई की ओर ध्यान नही दे पा रहा था। माता-पिता चिन्तित रहने लगे। मां ने अपने पिता यानी मेरे नानाजी को यह बात बताई । नानाजी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के साथ-साथ समाज-सेवक भी थे। मै उनसे बहुत प्रभावित था। मै नानाजी की हर बात को बड़े ध्यान से सुनता था। वे रिलैक्स होकर बहुत रूक-रूक कर बाते करते थे। उन्होने मुझे एक दिन अपने पास बिठाकर  पूछा कि -
''तुम क्या करना चाहते हो..?``
''मै अपने समाज को ऊपर उठाना चाहता हूं।`` मैंने गर्व से अपना जवाब दिया। यह सोचते हुए कि नानाजी मेरा पीठ थपथपायेगें। मेरा उत्साहवर्धन करेगें।
''जब तुम खुद ऊपर उठोगे तथा ऐसी मजबूत स्थिति में पहंुच जाओगे कि तुम्हारे नीचे आने का भय नही होगा, तभी तो तुम दूसरों को ऊपर उठा सकोगे। ये तो बड़े दुख की बात है कि तुम तो खुद नीचे हो और दूसरों को उपर उठाना चाहते हो। ऐसी उल्टी धारा तो मैने कही नही देखी।``-उन्होने कहा उनकी इस बात का मेरे जेहन में बहुत असर हुआ और सामाजिक गतिविधियों पर से ध्यान हटाते हुए मैने अपना पूरा ध्यान पढ़ाई में लगाना प्रारंभ किया । १९९८ में मुझे शासकीय नौकरी मिली, इसी बीच मै सुदर्शन समाज, वाल्मीकि समाज के कार्य-क्रमों में एक दर्शक की भंाति जाता था। मुझे सुदर्शन ऋषि का इतिहास जानने की इच्छा होती मै इस समाज के नेताओं से इस बाबत पूछताछ करता तो सब अपनी बगले झाकनें लगते। मैने इसका इतिहास विकास उत्पत्ति हेतु सामग्री इकट्ठी करनी शुरू की। मैं जैसे-जैसे किताबों का अध्ययन करता गया , मेरी आंखो से धुंध छॅटती गई। अब सुदर्शन ऋषि, वाल्मीकि ऋषि एवं उनके नाम पर समाज का नामाकरण मुझे गौण लगने लगा। डा. अम्बेडकर की शूद्र कौन और कैसे ? तथा अछूत कौन है? पढ़ी तो पूरी स्थिति स्पष्ट हो गई। दलित आन्दोलन से ही समाज ऊपर उठ सकता है, मुझे विश्वास हो गया। मैने अपनी चर्चित पुस्तक ''सफाई कामगार समुदाय`` पर काम करना प्रारंभ किया । कई किताबों, लाइब्रेरियों की खाक छानी बुद्धिजीवियों के इन्टरव्यू लिये। इसी परिप्रेक्ष्य में मेरा दिल्ली आना हुआ और मेरी मुलाकात एड. भगवानदास जी से हुई। मैने पहले उनसे फोन पर बात की, उन्होने शाम को मिलने हेतु समय दिया। जब शाम को फ्लैट में उनसे मुलाकात हुई तो देखा सफेद बाल वाले, उची कद के बुजुर्ग कक्ष मे किताबों से घिरे बैठे है। मैने उन्हे बताया कि मै उनकी किताब से बहुत प्रभावित हूं तथा उन्हे एक चिट्ठी भी लिखी थी । अभी मै इस विषय पर रिसर्च कर रहा हूं। उन्होने कहा चिट्ठी इस नाम से मुझे मिली थी । मैने सफाई मुद्दे पर कई प्रश्न पूछे उन्होने बड़ी ही संजीदगी के साथ मेरे प्रश्नों का उत्तर दिया । उन्हे यकीन नही हो रहा था कि मै ऐसा कोई गंभीर काम करने जा रहा हूं। वे इसे मेरा लड़कपन समझ रहे थे । उनका व्यवहार, उनके मन की बात मुझे अनायास ही एहसास करा रही थी। वे कह रहे थे लिखने-विखने मे मत पड़ो और खूब पढ़ो । उन्होने अंग्रेजी की कई किताबे मुझे सुझाई । मैने उनको नोट किया। ये किताबे मुझे उपलब्ध नही हो पाई। शायद आउट आफ प्रिन्ट थी । उन्होने अपनी लिखी कुछ किताबे मुझे दी और अपने पुत्र से कहने लगे, इनसे किताब के पैसे जमा करा लो । मैने एक किताब ली और शेष किताबे पैसे की कमी होने के कारण नही ले सका । यही मेरी उनसे पहली मुलाकात थी । उनसे मैने उनकी जाति सम्बन्धी प्रश्न पूछा, लेकिन वे टाल गये । शायद वे मुझे सवर्ण समझ रहे होगें। मै लौट आया ।
इस समय राजकमल प्रकाशन के प्रबंध निदेशक श्री अशोक महेश्वरी जी ने इस किताब को प्रकाशित करने हेतु सहमति दे दी थी। २००५ को यह किताब प्रकाशित होकर बाजार में उपलब्ध हो गई। नेकडोर ने सन २००७ को दलितों का द्वितीय अधिवेशन आयोजित किया। उन्होने मुझे सफाई कामगार सेशन के प्रतिनिधित्व हेतु आमंत्रित किया। दिल्ली में हुए इस कार्यक्रम में एड. भगवानदास जी भी आये थे। मैने उनसे मुलाकात की एवं हालचाल पूछा लेकिन वे मुझे पहचान नही पा रहे थे। शायद उनकी स्मरण-शक्ति कुछ कम हो गई थी। कुछ लोग विभिन्न भाषा में ''मै भंगी हूं`` किताब के अनुवाद प्रकाशित होने पर बधाई दे रहे थे। मुझे आश्चर्य हुआ कि कुछ अनुवाद के बारे मे उन्होने अनभिज्ञता जाहिर की। वे बधाई सुनकर बिल्कुल नार्मल थे। कोई घमंण्ड का भाव नही था। सबसे साधारण ढंग से मुलाकात कर रहे थे।
जब सफाई कामगारों पर सेशन प्रारंभ हुआ तो वे स्टेज में मेरी बगल में बैठे थे। मुझे अपने बचपन के वे दिन याद आने लगे, जब सामाजिक गतिविधियों में इनके बारे में चर्चा सुना करता था। बड़े ही गर्व से लोग इनके कार्यो की प्रसंशा करते थे। आज मै अपने-आपको सबसे बड़ा सौभाग्यशाली समझता हूं कि उनके साथ मुझे वक्तव्य देने का मौका मिला। स्टेज पर ही उन्होने मुझसे पूछा-
''संजीव खुदशाहजी, आप ही है न..?``
''जी हां`` -मैने कहां ।
''मैने आपकी किताब देखी, बहुत ही अच्छी लिखी है आपने । इस विषय पर इस तरह की ये पहली किताब है।`` - उन्होने कहा ।
इतना सुन कर मेरी आंखे नम हो गई। मैने उनको धन्यवाद दिया और कहा - ''आदरणीय इस किताब में आपका भी जिक्र है। मैने शोध के दौरान आपका इन्टरव्यू भी लिया था।``
वे मेरी ओर देखते हुए अपनी भृकुटियों में जोर डाल रहे थे, साथ ही सहमति में सिर भी हिला रहे थे।
आज उनकी जितनी भी किताबे उपलब्ध है, वह भंगी विषय पर पहले पहल किये गये काम का उदाहरण है। वे ये कहते हुए बिल्कुल भी नही शर्माते है कि उन्हे हिन्दी नही आती (आशय संस्कृत निष्ठ हिन्दी से है।)। फिर भी साधारण भाषा में लोकप्रिय साहित्य की रचना उन्होने की है। अपनी शैली के बारे में वे लिखते है कि मैं भागवतशरण उपध्याय की ''खून के छीटे इतिहास के पन्ने पर`` पुस्तक की शैली से प्रभावित हूं। अंग्रेजी और उर्दू भाषा पर वे अपना समान अधिकार समझते है। बावजूद इसके हिन्दी में उनकी कृति ''मैं भंगी हूं`` आज भी प्रासंगिक है।

Wednesday, October 19, 2011

अन्ना इन भ्रष्टाचारों पर मौन क्यों है ?

संजीव खुदशाह
अन्ना तथा कथित पाक-साफ छबी के बताये जाते है। यहां पाक छबी के भी अपने-अपने पैमाने है। चाहे कुछ भी हो अन्ना अपने आपको आम भारतीय का प्रतिनीधि बताते है जो कम से कम लोकतंत्र में एक सफेद झूठ जैसा है। चंद शहरी लोगों को लेकर सिविल सोसाईटी का निमार्ण करने कि प्रक्रिया, आम भारतीय की जुबान बनने का प्रमाण पत्र नही है। दरअसल प्रश्न ये उठता है कि क्या ये सोसाईटी चंद तथाकथित बुध्दिजीवि, धनी, राजनेताओं का जमावड़ा है जिसमें कुछ पर्दे के सामने है कुछ पर्दे के पीछे ?

यदि अन्ना और उसके प्रमुख सहयोगियों कि बात करे तो वे गांधीवादी होने के बहाने हमेशा हिन्दूवाद को ही बढ़ावा देते है। उनके इस आन्दोलन में दलित आदिवासी एवं अल्पसंख्यक का कोई स्थान नही है यदि स्थान है भी तो केवल भीड़ बढ़ाने के लिए। इस आन्दोलन में हावी वे ही लोग है जो समाजिक धार्मिक भ्रष्टाचार के मुद्दे पर मौन रहते है।

अन्ना के आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य लोकपाल है न कि भ्रष्टाचार का खत्मा
अन्ना ने लोकपाल विधेयक पर अपना ध्यान केन्द्रित किया है। यहां प्रश्न यह उठता है कि क्या सिवील सोसायटी का जनलोकपाल के पास हो जाने पर भ्रष्टाचार समाप्त हो जायेगा? क्या प्रधानमंत्री को लोकपाल के नीचे लाने पर भ्रष्टाचार खत्म हो जायेगा। शायद सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए ये जुमले अच्छे लगते है लेकिन ऐसा लोकपाल लागू होने पर लोकतंत्र को ही खतरा हो सकता है। चुने हुए प्रतिनीधि का महत्व खत्म हो जायेगा। अन्ना के साथ-साथ आम जनता को गुमराह करने का सबसे बड़ा काम चंद धर्मवादी मीडिया भी कर रही है। जो अन्ना को एक हीरों कि तरह पेश कर रही है । आखिर टी आर पी भी तो काई चीज़ है चाहे इसके लिए समाजिक हितों की ही क्यो न बली देनी पड़े।  इस काम के लिए प्राईवेट न्यूज चैनलो को महारत हासिल है।
इन भ्रष्टाचार पर अन्ना मौन है
उपरी तौर पर जो भ्रष्टाचार हो रहा है उसका कारण यह है कि हमारे रोम रोम में भ्रष्टाचार व्याप्त है जबतक भारत का आम आदमी भ्रष्ट रहेगा तब तक ऐसे हजारो लोकपाल बिल व्यवस्था को बदलने मे असक्षम रहेगे। आईये अब आपको बताते है कि भ्रष्टाचार की शुरूआत कहा से हो रही है।
बच्चे के जन्म से भ्रष्टाचार- आज एक आम भारतीय के घर कोई महिला गर्भवती होती है, तो भ्रष्टाचार प्रारंभ हो जाता है। परिवार के लोग लड़का होने के लिए मन्नत, चिरैरी करते है जो आगे बढ़कर सोनोग्राफी तक पहुच जाता है। लड़का हुआ तो भ्रष्टाचार को आचार बनायेगा, लड़की हुई तो वो भी उसी भ्रष्टाचार का अभिन्न अंग बनेगी। क्लास में पास होना तो भ्रष्टाचार, एंडमिशन होना हो तो भ्रष्टाचार। रोम-रोम में भ्रष्टाचार बसा है तो जब वो बच्चा या बच्ची बड़ी होकर उच्चे ओहदे में आने के बाद भ्रष्टाचार में लिप्त नही होगे ऐसा कैसे हो सकता है।
धार्मिक भ्रष्टाचार- भारत में जिस प्रकार से धार्मिक भ्रष्टाचार को मान्यता है वह किसी वहसी समाज में ही संभव है। मनुस्मृति, वराह पुराण, भागवत गीता आदि हिन्दू धर्म ग्रंथ हमेशा उच-नीच को ही बढ़ावा देते है। जिससे जाति भेद, लिंग भेद को धार्मिक स्वीकृति मिलती है। इन्ही धर्म ग्रंथो से जिन जातियों को शोषण करने का अधिकार मिलता है वे हिन्दूवाद को बढ़ाना चाहते है तथा वे ये भी चाहते कि भारत का संविधान इन धर्म ग्रन्थो से प्रतिस्थापित हो जाये ताकि भ्रष्टाचार में उनका ऐकाधिकार रहे। यदि अन्ना वास्तव में भ्रष्टाचार मिटाना चाहते है तो इन उच-नीच को बढ़ावा देने वाले धर्म ग्रन्थों की मान्यता रद्ध करवाये उसकी सार्वजनिक होली जलाये। लेकिन वे ऐसा नही करेगे क्योकि कोई अपने पैरो में कुल्हाड़ी क्यो मारेगा। यानि जिससे हमे हानी हो रही हो वो भ्रष्टाचार खत्म होना चाहिए और जिससे हमे लाभ हो रहा हो वो भ्रष्टाचार जारी रहना चाहिए। ऐसा शिक्षीत समाज का मानना है।
समाजिक भ्रष्टाचार- भारत में सामाजिक भ्रष्टाचार धर्म ग्रंथो की कोख से पैदा हुआ है। जिसके गिरफ्त में हिन्दू तो है ही साथ में मुस्लिम, सिक्ख, जैन, बौध्द, इसाई भी इससे अछूते नही है। यानि ये नही कहा जा सकता की फला धर्म में समाजिक भ्रष्टाचार नही है। भारत में जिस भी धर्म ने प्रवेश किया वे समाजिक भ्रष्टाचार से नही बच सके क्योकि जितने भी लोगो ने उन धर्मो को अपनाया वे पहले से ही समाजिक भ्रष्टाचार में लिप्त थे। बहुत इमानदार समझने वाला व्यक्ति भी यदि अपनी कालोनी मे गैस सिलेडर की ट्राली आते देख ५० रूपये ज्यादा देकर अपनी पारी आये बिना सिलेडर लेने में कोई गलती नही समझता है। उसे लगता है कि उसने कोई भ्रष्टाचार नही किया। यहां बिना लाईन पर खड़े हुये ब्लैक में टिकिट लेना, टैक्स चोरी करना, सीना जोरी कर प्रशासन से नियम विरूध काम करवाना, अपनी जाति भाई के लोगो को फायदा पहुचांना भ्रष्टाचार में शामिल नही है।
राजनीतिक भ्रष्टाचार-पहले के बजाय आज राजनीतिक भ्रष्टाचार कम है, आज जो भ्रष्टाचार दिख रहा है जिसके विरूध अन्ना लाम बंद हो रहे है वो दरअसल राजनीतिक भ्रष्टाचार ही है पहले सामंति युग में यह भ्रष्टाचार चरम पर था जहां एक ओर किसी वर्ग को देवतुल्य सुविधाऐ थी तो एक वृहद जन समुदाय को जानवर से भी बदतर समझा जाता था। उसे मानव अधिकार भी प्राप्त नही थे। लेकिन अब तक ज्ञात भारत के इतिहास में पहली बार लोकतंत्र लागू हुआ है और हासिये पर पड़े उस वर्ग को भी थोड़े बहुत मानव अधिकार प्राप्त हुऐ है। उसके बावजूद आज का भारत अन्य देशो के मुकाबले राजनीतिक मुआमले में ज्यादा भ्रष्ट है। ये महज इत्तेफाक नही है कि आजादी के तुरंत बाद भारत के प्रधानमंत्री सहित देश के सभी राज्यो के मुख्यमंत्री किसी एक ही जाति से ताल्लुक रखते थे।
प्रशासन में भ्रष्टाचार- चूकि भारत में राजनीतिक शक्ति किसी एक वर्ग के पास थी इसलिए प्रशासन में भी उसी वर्ग का राज था और वे लोग भ्रष्टाचार को सदाचार समझ कर निभाते आये। जब तक राजनेता भ्रष्ट रहेगे उनके द्वारा संचालित प्रशासन भी भ्रष्ट ही रहेगा। आज प्रशासन की कार्यविधी इतनी जटील है कि एक साधारण से कर्लक के पास ये अधिकार है कि वह फाईल को रोक ले या आगे बढने दे। प्रशासन में जवाबदेही को लेकर आज भी संदेह है। अधिकारी अरामतलब है तो कर्मचारी काम के बोझ तले दबा जा रहा है। काम की अधिकाता वेतन में विसंगती वर्तमान में भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने के लिए जिम्मेदार है। महत्चपूर्ण पद पर बैठे अधिकारी कर्मचारी का वेतन इतना कम है कि वे अपने परिवार का पोषण करने में असक्षम पाते है। और महत्वपूर्ण कार्य में भ्रष्टाचार के आफर को वे ठुकरा नही पाते। इसलिए प्रशासन में भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए सबसे पहले हर पदो की जवाबदेही निश्चित की जानी चाहिए साथ ही पदानुसार वेतन सुविधाओं की विसंगती को खत्म किया जाना चाहिए।
प्राईवेट क्षेत्रो में भ्रष्टाचार चरम पर है -आज प्राईवेट क्षेत्रों में भ्रष्टाचार चरम पर है जिसके तरफ कोई ध्यान नही देता है। इसके लिए मै एक उदाहरण देना जरूरी समझता हू। एक लोकप्रिय राष्ट्रीय समाचार पत्र ने १०० पद सर्वेयर का निकाला जिसमें युवक युवती की भर्ती की गई ५०००/- वेतन की बात हुई। सर्वेयर को समाचार पत्र का विज्ञापन करना था तीन महिने शहर गांव की गली-गली की खाक छानी और सामाचार पत्र की चल पड़ी । उस समाचार पत्र ने इन्हे एक-एक महिने का वेतन थमाया और तुम्हारी जरूरत नही कह कर नौकरी से निकाल दिया। ये भर्तियां पहले से ही सुनियोजित होती है। इसी प्रकार का छल फैक्टी में, दुकानो में, घर में काम करने वाले नौकरो के साथ रोज घटीत होता है लेकिन आवाज कौन उठाये। बड़ी-बड़ी नेशनल इन्टरनेशनल कम्पनीयां इस काम में माहिर है। चाहे मामला जमीन हड़पने का हो या ३जी घोटाले का। लोगो से महिनो काम लिया जाता लेकिन वेतन नसीब नही होता। शिकायत कहां करे। प्रशासन में भ्रष्टाचार हो तो उसकी शिकायत उसके बड़े अधिकारियों से कि जा सकती है प्राईवेट सेक्टर में शिकायत किससे करे।
बेहतर होता अन्ना भ्रष्टाचार को गहराई से समझते और उसे समूल उखाड़ने की मुहीम चलाते किन्तु ये मुहिम आम लोगो की मुहिम नही है इसलिए इस बात की गुन्जाईश भी नही है जिसके लिए मैने तर्क उपर दिये है। दरअसल जबतक अन्ना या अन्ना जैसे लोग धार्मिकवाद का मोह नही त्यागेगें तब तक भारत से भ्रष्टाचार का खात्मा नही होगा यदि भ्रष्टाचार है तो है चाहे वह किसी भी मुआमले में हो वह गलत है उसका खात्मा होना चाहिए। लोकपाल तो लोकप्रियता और टीआरपी का खेल है इससे न कुछ खास होना है न वे (आश्य आन्ना आंदोलन से है) ऐसा कुछ खास होने देना चाहते है।


Friday, June 10, 2011

क्रीमिलेयर की औलादें

संजीव खुदशाह
एक डिप्टी कलेक्टर ने अपनी विद्वता को प्रदर्शित करते हुए बड़े ही गंभीर लहजे में कहा-''यार आरक्षण जैसी सुविधायें अत्यंत पिछड़े लोगों के लिए है उपर उठे लोग यानी क्रीमिलेयर को चाहिए की वे अपने अन्य भाई बन्धुओं के लिए आरक्षण का लाभ लेना बंद कर दे ताकि उन्हे भी मौका मिल सकें। हम जैसे लोगों को भी लाभ लेना बंद कर देना चाहिए।`` क्रीमिलेयर को इस तरह परिभाषित करने तथा आरक्षण पर ऐसे तर्क देने पर मुझे उस अधिकारी पर बड़ा आश्चर्य हुआ। आश्चर्य इसलिए और भी ज्यादा हुआ की वे स्वयं सुनार जाति के है जो ओ.बी.सी. से ताल्लुक रखती है।
भारतीय समाज में सुनारों की स्थिती किसी से छिपी नही है। सेठों के यहां जेवरों के लेबर के रूप में ये जातियां कालकोठरी नुमा परिस्थियों में काम करती है। बारीक तकनीकि काम तथा रसायनिक धुयें से घिरे होने पर इन्हे दमा, फेफड़े सम्बधी बिमारियों की शिकायत आमतौर पर रहती है। उस पर भी काम की महत्ता के अनुपात में बेहद कम मजदूरी इन्हे दी जाती। सोने जैसी महत्वपूर्ण धातु के कारीगर होने के गुमान तथा ज्वैलरी के चमकधमक भरे शोरूम में इनकी आवाज कण्ठ से उपर नही निकल पाती है।
यह चिन्ता का विषय है कि कितनी सोनी जाति के लोग प्रथम श्रेणी अधिकारी बने है? कितने मंत्री बने है? कितने लोग ज्वैलरी शोरूम के मालिक हैइन प्रश्न के उत्तर में आकड़ा नगण्य है। सिर्फ सुनार ही नही सारी अगड़ी/पिछड़ी माने जानी वाली ओ.बी.सी. की जातियों की स्थिति ऐसी ही है।
क्रीमिलेयर एक ऐसा शब्दचक्र है जो सामान्य बुध्दिवाले व्यक्ति का दिवाला निकाल दे। आईये इस शब्द से मै आपका परिचय कराता हूं। क्रीमिलेयर शब्द गरम दूद्ध के उपर जमी मलाई की परत के लिए इजाद हुआ है। यानी दूद्ध का वो उपरी हिस्सा जिसमें क्रीम ही क्रीम है।
पिछड़ा वर्ग आरक्षण के संबंध में इस शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश में किया गया था। बस इस शब्द को सामंतवादियों ने कैच कर लिया और आरक्षण को भोथवा (प्रभाव कम करने) करने के लिए इसे एक औजार के रूप में प्रयोग किया जाने लगा। जिसमें वे बहुत हद तक सफल भी हुए। यहां मै आपकों ये बताना भी जरूरी समझता हूं कि कानून में इस शब्द का कही प्रयोग नही किया गया है, न ही सरकारी तौर पर इस मामले में सर्वस्वीकृत शब्द है।
फिर भी सामंतवादियों ने तथा उनके प्रतीनिधियों ने (जो प्रगतिशीलता या बुद्धजीवियों का मुखौटा पहने हुए है) ने अतिपिछड़ी जातियों के आरक्षण जैसी सुविधाओं के विरोध में इस शब्द का जम कर प्रयोग किया। दरअसल उनके निशाने में वे लोग थे जिन्होने आरक्षण का लाभ लेकर सरकारी नौकरी में अपना स्थान बनाया। ये बात सामंतवादियों के सहन से बाहर थी कि एक निम्न जाति का व्यक्ति उनके बराबर आकर बैठे। इसलिए सबसे पहले उन्होने क्रीमिलेयर और नान क्रीमिलेयर दो पार्ट किये।
क्रीमिलेयर को कहा अपने से नीचे के लिए ये सुविधायें लेना बंन्द कर दो। नान क्रीमिलेयर से कहा क्रीमिलेयर तुम्हारा हक मार रहे है। अब तुम्हे इनसे संघर्ष करना है। ये प्रक्रम फूट डालों, राज करो की नीति जैसा था। नानाक्रीमिलेयर (ऐसे स्वजाति बंधु जिन्होने आरक्षण का लाभ अभी तक नही लिया है) तो इन बातों में नही आये, लेकिन अपने आपको  क्रीमिलेयर समझने वाले लोग जल्द ही इनके झांसे में आ गये। इन्होने न तो सही वस्तुस्थिती को समझने की कोशिश की, न ही आकड़ों  पर ध्यान दिया। भ्रमीत तर्को पर वे गुमराह होते गये। भले ही इन लोगों ने आरक्षण का लाभ लेना नही छोड़ा, किन्तु इन सामंतवादियों के सिद्धांत के समर्थन में आ खड़े हुए।
सच्चाई क्या है?
सच्चाई यह है कि कुल आरक्षण हितग्राहियों का मात्र ७% प्रतिशत ही क्रीमिलेयर में आता है। जो इनकी आखों में खटकते है। दूसरी ओर आज भी हजारों बैकलाग (बैकलाग वह खाली पड़े आरक्षित पद है जो अजा अजजा तथा पिछड़ा वर्ग द्वारा आज तक नही भरे जा सके।) खाली पड़े है जिन्हे भरने हेतु आरक्षण हितग्राही आवेदन भी नही दे रहे है। यदि क्रीमिलेयर भी अपना अधिकार छोड़ दे तो बैकलाग पूरी की पूरी खाली रह जायेगी और इनकी शातिर चाल कामयाब हो जायेगी। क्योकि खाली पद को उपयुक्त आवेदक नही कहकर जनरल शीट घोषित कर दिया जाता है।
इस प्रकार प्रगतिशीलतावादियों की चाल कामयाब हो जाती है। अब प्राकृतिक न्याय की कसौटी पर यह प्रश्न खड़ा होता है कि क्या ऐसे क्रीमिलेयर को आरक्षण आदि लाभ लेना छोड़ देना चाहिए? इसके जवाब में एक प्रश्न और उदित होता है कि आरक्षण का मुख्य लक्ष्य क्या था? वास्तव में उस प्रश्न का जवाब इस प्रश्न के उत्तर में छिपा है । आरक्षण का मुख्य उद्देश्य है सामाजिक समानता लाना है  न की आर्थिक समानता। समाजिक समानता हेतु शासन प्रशासन में बराबर की भागीदारी आवश्यक है। और समाजिक समानता का अर्थ यह नही है कि एक साथ बैठकर खाना, घूमना या पिक्चर देखना। सामाजिक समानता की पुष्टी इस बात से होगी जब ब्राम्हण अपनी बेटी का रिश्ता लेकर दलित के घर जायेगा। यानी जाति का महत्व खत्म हो जायेगा। जब तक एक जाति अपने आपको उची समझती रहेगी दूसरी छोटी जाति प्रताड़ित होती रहेगी। दिखावटी समानता चाहे कितनी भी हो जाय। चाहे क्रीमिलेयर कितना ही तरक्की कर जाये जाति के लांछन से नही बच पाता है। जब उसे उतनी ही लांच्छना का शिकार होना पड़ता है जितना उसके गरीब समाजिक बंधु तो क्यो क्रीमिलेयर आरक्षण के अधिकार को छोड़ दे। मै ऐसे भंगी जाति में जन्मे व्यक्ति को जानता हूं जो राज्यपाल जैसे महत्वपूर्ण पद पर आने के बाद भी जातिगत लांच्छन से नही बच सके। उसी प्रकार सवर्ण मीडिया द्वारा लालु यादव को मसखरा तथा मायावती को बदमीजाज प्रचारित करना उसी जातिगत लांछना का ही परिणाम है।
अब क्रीमिलेयर या उनकी औलादों को कौन सिखाये की कुत्ता का गूं बनना या छोबी का कुत्ता बनना एक ही मतलब है बताया तो उसे जा सकता है जो ये माने की उसे जानना बांकी है जो स्वयंभू ज्ञाता है उन्हे तो समय ही सिखा सकता है । काश समाजिक चेतना की बयार जो नीचे के तबके में बह रही है उपर के तबके को भी कुछ हवा देती (क्रीमिलेयर से आश्य है)।

Saturday, October 17, 2009

आधुनिक भारत में पिछड़ा वर्ग (पूर्वाग्रह, मिथक एवं वास्तविकताऍं)

मैं जानता था कि इस विषय पर कलम उठाना एक बेहद दुस्साहसिक एवं दुष्कर कार्य है, लेकिन मेरे पूर्व शोध प्रबन्ध हेतु जुटाई सामग्री ने मेरा मेरा हौसला बनाये रखा। मेरा इस विषय पर लिखने की दो बड़ी मजबूरियां थी। पहली यह की करीब ५२ प्रतिशत जनसंख्या वाला यह पिछड़ा वर्ग सामाजिक चेतना में भी पिछड़ा क्यों है? दूसरा यह कि सामाजिक क्रांति जो दलितों में किशोरावस्था में है, इनमें शून्य क्यों है? इसका जवाब उतना आसान नही है जितना आमतौर पर अंदाजा लगाया जाता है। दरअसल इसके पीछे कई तथ्य हैं, जिनका जिक्र किताब में किया जा रहा है। उनमें से महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इस पिछड़ेपन के लिए स्वयं का भी उतना ही दोष है, जितना कि इसे पिछड़ा बनाये रखने के लिए व्यवस्था का दोष है। इसका कारण यह भी है कि कईयों को जाति व्यवस्था में अपनी स्थिति को लेकर भ्रम है। कुछ तो अपने आपको ब्राम्हण-बनीया या ठाकुर समझते है। तो कुछ ऐसे जी-तोड़ प्रयास कर रहे है। वास्तव में ब्राम्हणवादी व्यवस्था में ब्राम्हण बनने की होड़ लगी हुई है, जबकि ये मुश्किल ही नही नामुमकिन भी है। रोचक तथ्य यह है की ऐसी होड़ में लगने के लिए पहली शर्त यह है की आप आंख मूंदकर ब्राम्हणवाद का पालन करें। यानि 'ढोर गवांर शूद्र पशु नारी ये है ताड़न के अधिकारी` को संस्कृति का हिस्सा मानें। विरोध करने पर जाति प्रथा में नीचे ढकेल दिये जाने का भय है। दरअसल पूरी व्यवस्था ऐसा करने हेतु उकसाती है, ताकि अंतहीन होड़ चलती रहे और कुछेक की रोटियां सिंकती रहे।
पिछड़ा वर्ग वास्तव में किसी विशेष धर्म से ही संबंधित नही है। बल्कि अन्य धर्मो में भी यह वर्ग विद्यमान है हमने हिन्दू धर्म के अंतर्गत आने वाले पिछड़ा वर्ग की जातियों को फोकस करते हुऐ अन्य धर्मावलंबी पिछड़ा वर्ग की जातियों को भी शामिल किया है। ताकि यह कार्य परिपूर्ण हो सके।
इसमें जाति उत्पत्ति के सम्बन्ध में कई धर्म-ग्रन्थों के सन्दर्भ लिऐ गये है उनके श्लोकों का विवरण दिया गया है। इसके पीछे मेरा उद्देश्य यही नही है कि किसी की भावना को ठेस लगे, बल्कि आम लोगों को व्यवस्था की एक भयानक सच्चाई से अवगत कराना है। प्रत्येक जाति दूसरी जाति से ऊची अथवा नीची है। समानता के लिए यहां कोई स्थान नही है। ये भावना व्यवस्था ने ही आम जनता में डालें है, जो बहुत लम्बी प्रक्रिया का परिणाम है। मेरा अध्ययन परिणाम यह बतलाता है कि नस्लवादी, वंशवादी और टोटम परम्परा पर ही वर्तमान जाति-प्रथा आधारित है। किन्तु ऊंच-नीच का कारण ये परम्पराएं नही है।
लेखक की कलम से --संजीव खुदशाह किताब से -- आधुनिक भारत में पिछड़ा वर्ग (पूर्वाग्रह, मिथक एवं वास्तविकताऍं)

Thursday, June 11, 2009

भंगियों का जीवन आज भी त्रासदीयों से भरा है।

भंगियों का जीवन आज भी त्रासदीयों से भरा है।
  • संजीव खुदशाह
सत्य कड़वा होता है, यह एक अनुभव का विषय है। यह कितना कड़वा होता है इसका अन्दाजा तभी लगाया जा सकता है, जब इससे सामना होता है। आज हम चाहें जितना भी कहे कि हम विश्व की महाशक्ति बनने जा रहे हैं या हम विश्व शान्ति के प्रतीक हंै। किन्तु सफाई कामगारों के प्रति हमारी मानसिकता समस्त दावांे को खोखला साबित कर रही है। आज भी लगभग ५० विभिन्न जातियों का समूह, भंगी समुदाय के लोग १९३१ वाली सामाजिक स्थिति में जीवन जीने के लिए बाध्य हैं। सरकारी आंकड़े चाहे जो दावे प्रस्तुत करते रहे हांे किन्तु सामाजिक बदलाव अभी भी कोसों दूर है जबकि इन्हंे सामाजिक समता दिलवाने के उद्देश्य से ही आरक्षण तथा अन्य कानूनी सुविधाए मुहैया कराई गई थीं। लेकिन दुर्भाग्य यह रहा कि ये सारी कार्यवाहियाँ कथनों तक ही सीमित रहीं। इसका प्रमुख कारण इन सुविधाओं को उपलब्ध कराने वाले तंत्र की खानापूर्ति एवं उपेक्षा पूर्ण रवैया रहा। यह तंत्र अपने आपको सिर्फ इसी काम के लिए व्यस्त रखता की किस प्रकार इन सुविधाओं को पहुचाने तथा उन्हे मुहैया कराने से वंचित करने के लिए कानूनी दंाव पेच अथवा टालमटोल किया जा सके। हालांकि सरकार की मंशा इन्हे घ्पर उठाने की रही। इसका सबसे बड़ा सबूत है भंगियों की भारत में आज भी नारकीय जीवन जीने की बाध्यता। आज भी सिर पर मैला ढोते मानव को देखा जा सकता है। संदर्भ देखे (आंध्रप्रदेश की रिपोर्ट बुक) । आज भी परिस्थितियॉं बनाई जाती है कि वे इसी अमानवीय कार्य को करते रहे। गोहना, झज्जर, तथा चकवाड़ा काण्ड इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। ऐसा कौन मानव होगा जो स्वेच्छा से दूसरे मानव का मल-मूत्र साफ करने का कार्य करना चाहेगा या पुश्तैनी सफाई कार्य करना चाहेगा। कई बार वरिष्ठ समाज सेवियों व्दारा यह कहते सुना जा सकता है कि ये लोग अपने पतन के लिए खुद जिम्मेदार हैं क्योंकि इन्हे दूसरा काम पसंद ही नहीं आता। जबकि सत्य यह है कि ऐसे कई प्रयास सरकारी तथा गैर सरकारी तौर पर किये गये हंै कि यदि भंगी, भंगी (सफाई) का कार्य छोड़ें तो उसे दंण्डित किया जाये उदाहरण देखें (संदर्भ-) ''१९१६ के संयुघ् प्रान्त नगरपालिका अधिनियम-११ की धारा २०१ में यह व्यवस्था थी कि यदि कोई जमादार (मेहतर), जिसका किसी घर या भवन में घरेलू सफाई का प्रथागत अधिकार है, सफाई का काम करने से मना करता है, तो मजिस्टघ्ेट को अधिकार है कि वह ऐसे जमादार पर दस रूपये तक का जुर्माना कर सकता है। ऐसा ही कानून १९११ के पंजाब नगर पालिका की धारा १६५ में था कि सफाई का काम बंद करने वाले जमादार पर दस रूपये का जुर्माना और जब्ती का आदेश भी दिया जा सकता है। और धारा १६५ के तहत उसकी अगली बड़ी अदालत में अपील नहीं की जा सकती।`` आप खुद ही अंदाजा लगा सकते है कि उस वघ् दस रूपये की की्रमत क्या होगी जब इन कामगारों की महीने भर कि कमाई दस रूपये से भी कम थी। ऐसे में कोई भंगी भला कैसे अपने समाजिक एवं आर्थिक पिछड़े पन से उबर पाता।
इस बारे में गांधी जी ने भी कहा है कि ''आप अपना काम इमानदारी से करें तभी तुम्हारा अगला जन्म उच्च कुल में होगा।`` दूसरी ओर डॉ. अम्बेडकर जी ने कहा-कि ''उच्च कुल का आदमी मरते मर जायेगा किन्तु ऐसा गंदा काम वो हरगिज़ नहीं करेगा। तो तुम्हारे पास क्या मजबूरी है? सबसे पहले इस गंदे पेशे से छुटकारा पाओ तभी तुम्हारा भविष्य उज्जवल होगा।`` गांधी जी का उघ् ब्यान हिन्दू धर्म के पुनर्जन्म का एक ऐसा पासंग है कि आज इस पासंग से शीघ्र मुघ् होने की आवश्यकता है। क्यांेकि यह एक ऐसा झुनझुना है जिसके द्वारा जनता को बहलाकर हम अपने सामाजिक दायित्व बोध से मुघ् होना चाहते है तथा निर्दोष होने का चोला पहनना चाहते हैं। संदर्भ देखें । आज हम चांद पर पहॅंुच चुके है पर न जाने कब हम अपनी रूढ़ियों से निजात पायेंगे। हम अपनी रूढ़ियों के प्रति इतने जड़ हो जाते हैं कि हम इसे दूर करने के बजाय इसे संस्कृति का एक हिस्सा बताने लगते हैं तथा संस्कृति बचाओ की दुहाई देकर इन रूढ़ियों को और पुष्ट करने का ही प्रयास करते हंै। आश्चर्य तब और ज्यादा होता है जब इस समुदाय के लोग, जिन्होने दलित आंदोलनो का लाभ पाकर घ्ॅंचे मुकाम हासिल किये हैं वे भी इन्ही सवर्णों के पद चिन्हों में चलते हुऐ इन्ही रूढ़ियों (कथित संस्कृति) का समर्थन कर अपनी जड़े स्वयं कमजोर करते देखे जाते है।
दैनिक अखबारों में आये दिन दलित प्रताड़ना की खबरंे आती रहती हैं। आज भी सवर्णों द्वारा एक अछूत स्त्री को निरवस्त्र घुमाना कोई अपराध नहीं समझा जाता। एक दलित महिला को केवल इसलिए नंगी करके गांव में घुमाया फिर जला दिया गया, क्योंकि वह दलित जाति की होने के बावजूद सरपंच चुनाव में पर्चा भरने की जुर्रत की थी। एक दलित जाति के आदमी को सरे आम सिर्फ इसलिए पीटा गया क्योकि उसने एक ठाकुर से खाट में बैठे-बैठे बात की थी। सवर्णों द्वारा दलित प्रताड़ना कि ताजी फेहरिस्त इतनी लम्बी है कि यदि इस पर लिखा जाय तो एक अलग ग्रंथ तैयार हो जाये। हम अपने ही जैसे मानव को एक पालतु जानवर तक का दर्जा देने को तैयार नहीं है और वहीं दूसरी ओर विदेशी मामलों में ''अतिथि देवोभव:`` का उद्घोष कर रहे हैं। यह बड़ा ही हास्यास्पद तथ्य है की हम अपने ही देश के लोगों को मनुष्य का दर्जा नहीं दे पा रहे है वहीं दूसरी ओर विदेशियों को भगवान का दर्जा देने की मुहिम जारी हैै। यह सच नकार नहीं जा सकता है।
ठेकेदारी करण - हांलाकि इस मामले में सेफ्टी-टैंक पैखाना की शुरूआत तथा खाटाउ (कन्टघी) पैखाने का बंद होना अपने आप में एक अच्छा संकेत रहा है। साथ ही सरकारी सफाई कार्यों का ठेकेदारीकरण एक प्रकार से शोषण ही है। क्योंकि ठेकेदारी या सरकारी दोनों मामलों में सफाई कामगार तो भंगी जाति के ही होते हैं। जबकि उन्हें सरकारी नौकरी में आजीवन सुरक्षा तथा अच्छा वेतन अन्य शासकीय सेवा की सुविधाएं प्राप्त हो जाती थी। किन्तु ठेकेदारी करण होने के कारण सारी मलाई ठेकेदार उड़ा लेता और भंगी जो ठेकादार की नौकरी करता है, वह पक्की नौकरी, वेतन तथा अन्य सुविधाओं से वंचित रह जाता है। जो सुविधांए वह स्थिर सरकारी नौकरी से उठा रहा था, अब ठेकेदारीकरण होने के कारण उल्टे आर्थिक तंगी एवं पतन की ओर तेजी से बढ़ रहा है। सफाई कार्य के ठेकेदारीकरण में भंगियों का हित कभी नहीं देखा गया केवल घ्ंचे मूल्य में ठेका देने तक की जिम्मेदारी उठाई जाती है किन्तु इससे एक सफाई कामगार का क्या शोषण हो रहा है इस ओर किसी का ध्यान नहीं जाता। ऐसा ही एक तथ्य अखिल भारतीय सफाई मजदूर कांग्रेस (टेघ्ड युनियन) की राष्टघीय कार्यकारिणी की बैठक के सामाचार (संदर्भ देखें) में सामने आया जिसमें कहा गया कि सफाई कामगार आयोग में जिन सदस्यों को मनोनित किया गया है वे सफाई कामगार समाज से संबंधित नहीं है न ही इस जाति के हंै। इस प्रकार अंजादा लगाया जा सकता है कि वे इनके हित एवं अहित के बारे क्या निर्णय लेते होगें ?
वर्तमान में कई सफल एवं प्रतिष्ठित पदों पर इस समुदाय (इनकी संख्या समाजिक औसत के हिसाब से बहुत ही कम है।) के लोग राष्टघ् को अपनी सेवाएं दे रहे है जैसे सांसद, मंत्री, राज्यपाल, विधायक, महापौर, सभापति, आय.ए.एस अधिकारी आदि। इतने घ्पर पहुचने के बावजूद इनमें अपनी जातिगत पहचान से बचने की कसक अवश्य दिखाई पड़ती है इसके दो प्रमुख कारण हैं। पहला - शिखर पर पहॅुचने के बावजूद इनमें समाज का सामना करने तथा समाजिक व्यवस्था को झकझोर देने वाली आत्मविश्वास की कमी है। दूसरा- यह है कि गैर सफाई कामगार समुदाय की इनके प्रति अस्वस्थ मानसिकता है। जो इन्हें जातिगत हीन भावना तथा गुलामी के बोध से उबरने नहीं देती। एक राज्यपाल जो भंगी जाति के थे, मैंने खुद उनके बारे में लोगों को जाति नाम का आक्षेप लागते देखा। इससे अन्य उच्च पदों के व्यघ्यिों के प्रति सवर्णों (गैर दलित) के दृष्टिकोण का अंदाजा लगाया जा सकता है।
यह कहा जा सकता है कि सफाई कामगार में यह चेतना आनी आवश्यक है कि वे इस काम से निजात (छुटकारा) लेकर समान नागरिकता-बोध खुद में पैदा करें। क्योंकि कार्य (पेशा) से समाजिक प्रतिष्ठा प्रभावित होती है। इतिहास गवाह है जिन्होने भी इस गंदे पेशे केा छोड़ा है, उनका जीवन-स्तर उठा है, इसके लिए समाजिक बुराई जैसे अशिक्षा, शराब बंदी भी आवश्यक है। इस दिशा में सरकारी स्वीपर पदों पर सवर्णों के आरक्षण की नीति भी अपने आप में उल्लेखनीय है। रेल्वे एवं नगर निगम में कई सवर्ण इस पद में पदस्थ हुए हंै, इससे निश्चित रूप से इस पेशे को महत्व मिलेगा। दूसरी ओर यह देखा गया है कि गैर भंगी इस पेशे में आरक्षण का लाभ लेकर स्वीपर की सरकारी नौकरी तो जरूर पा जाते है किन्तु वे सफाई का कार्य नहीं करते बल्कि किसी भंगी सेे ही बेगारी या मजदूरी में यह कार्य कराते है। कुछ लोगों का कहना है कि यह सर्वणों की चाल है। सरकारी नौकरी में प्रवेश पाने के बाद ये लोग अन्य अच्छे विभागों में अपना स्थानांतरण करवा लेते है चूकि उनके अफसर सवर्ण ही होते है वे इनकी मिली भगत से ऐसे कार्य को अंजाम देते है।
सनद रहे हमारी यह लापरवाही और दलितों के प्रति हमारी ये उपेक्षा राष्टघ् की प्रगती तथा तथाकथित उत्थान के दावों को झूठा न साबित कर दे। क्योकि कोई लेाकतंत्र, लोक की उपेक्षा के आधार पर कायम नहीं रह सकता। इसके लिए आवश्यक है कि उस नीव को मजबूत किया जाय जिससे राष्टघ् को स्थाई मजबूती प्राप्त हो सके। अत: अजादी के बाद से भंगीयों/दलितों की समाजिक समानता के लिए जिन कार्यों की उपेक्षा की गई, उनकी भरपाई की जानी चाहिए। इनमें दो दिशा में कार्य किया जाना आवश्यक है पहला आर्थिक उत्थान दूसरा सामाजिक सम्मान। मैने सर्वेक्षण में पाया है कि ज्य़ादातर गैर सरकारी संगठन (एन.जी.ओ.) इनकी सामाजिक चेतना (सम्मान) पर न ध्यान देकर केवल समाजिक संरक्षण पर ही ध्यान देते हैं सरकार का भी प्रयास इसी दिशा में ज्य़ादा होता है। यह एक अस्थाई विकास का उदाहरण है। स्थाई विकास एवं समाजिक चेतना के लिए आवश्यक है कि इनके विकास पर कार्य करने के लिए बने संगठन में इसी समाज के सक्रिय सदस्यों का भी सहयोग ऐसे कामों में लिया जाय। ताकि देश का सबसे आखरी सदस्य भी विकास की दौड़ में पीछे न रह जाये।

Thursday, December 4, 2008

सफाई कामगार समुदाय : पुस्तक चर्चा

सफाई कामगार समुदाय : पुस्तक चर्चा

युवा लेखक संजीव खुदशाह की खोज परक पुस्तक ''सफाई कामगार समुदाय`` को पढ़ना सफाई कामगारों के संघर्ष भरे जीवन से रूबरू होने के साथ ही इस अमानवीय त्रासदी भोगने वाले लोगों की अंत:कथा से मुठभेड़ करना भी है। आदमी ही आदमी का मैला साफ करें, केवल साफ करें वरन सर पर ढोये, यह कितना मानसिक पीड़ादायी होता है, इसकी कल्पना मात्र से ही रोये खड़े हो जाते है। बच्चे का हगा केवल माँ ही उठाती है। पिता तक उस काम से घिन करता है। ऐसे काम को पूरे समाज का मैला उठाने का काम एक वर्ग करे। अपनी संतान का गू उठाने के नाम पर ही पिता तक छि:-छि: करे, तो मैला उठाने और ढोने का काम कितना विकट हो सकता है। संजीव खुदशाह की पुस्तक पढ़ते समय दिल दिमाग संवेदनाओं से भर उठता है और इस घृणास्पद प्रथा को युगों तक जारी भारतीय समाज में कायम रखने से सर शर्म से झुक जाता है। इसका क्या ऐसी व्यवस्था कायम रखने का दम्भ भरने वालों को क्या दंड मिले। उपर से यह कि इतना जरूरी काम करने वाला वर्ग अछूतों के अछूत निम्नतर अछूत मान लिए जाएं। उनकी छाया तक से दूर भागे श्रेष्ठ वर्ग।
''सफाई कामगार समुदाय`` लिखते समय पता नही संजीव खुदशाह कितनी पीड़ा से गुजरे होगें। अपनी इस समाज-व्यवस्था और उसे कायम रखने वालों की स्मृति से कितनी बार उबकाई आई होगी उन्हे। बड़े साहस धर्य सहिष्णुता और विचार की ज़रूरत होती है ऐसी रचना करने में। और पुस्तक पढ़कर लगा कि संजीव ने साहस का काम किया है। युगों से पीढ़ियों से हमारे मानस पर यह अंकित किया जाता रहा कि सफाई कार्य, सफाई कामगारों का काम है। मैला उठाना सफाई कामगार करते है और ऐसा काम करना उनका अनिवार्य कत्तर्व्य है। वे इसी काम के लिए पैदा हुएं है। मेहतर को गाली के रूप में ग्रहण कराया गया। भारतीय समाज की त्रासदी यह रही कि यहां ''श्रम`` की कभी प्रतिष्ठा नही हुई और श्रम करने वालों को हेय समझा गया चाहे जूते बनाने वाले हो, कुम्हार हो, कृषक मजदूर हो,-छाता,ताला पतंग खिलौना आदि-आदि बनाने वाले तक सम्मान जनक स्थान प्राप्त नही कर पाए। और ''परजीवी`` ही प्रतिष्ठा पाते रहे व्यवस्था के केन्द्र में, शिखर पर, रहकर पूरी व्यवस्था पर नियम कायदे संचालित करते रहे। अभी तक हम केवल यही सोचते थे कि ब्राम्हण अछूतों से घृणा करते है। लेकिन संजीव खुदशाह ने खोज और अध्ययन के बाद यह तथ्य सामने लाया है कि अछूत भी ब्राम्हणों से उतनी ही घृणा करते है कुछ जातियों के लोग ब्राम्हण को अपवित्र मानते है। ब्राम्हण को अपवित्र मानते है। ब्राम्हण अछूतों से घृणा करते है तो यह खुद को श्रेष्ठ और पवित्र समझने के दम्भ के कारण है लेकिन अछूतों का ब्राम्हण को अपवित्र मानना पूरी समाजिक संरचना के बीच अपवित्र बना दिए गए वर्ग की सोच का परिणाम है। यह सोच एक लम्बी प्रक्रिया से पैदा हुई। संजीव खुदशाह ने काफी मेहनत से यह पुस्तक लिखी है।
पुस्तक के पांच खण्ड है और हर खण्ड में कुछ उपखण्ड है जिनमें उन विषय पर खोजपूर्ण और विद्वता पूर्ण व्याख्या है। विषय से सम्बंधित ज्यादा से ज्यादा सामग्री एकत्र करने का प्रयास स्पष्ट परिलक्षित होता है और विभिन्न मत, सहमतियों, असहमतियों का सम्मान जनक स्थान समावेश किया गया है। संजीव ने बिना राग द्वेष, लाग-लपेट और पूर्वाग्रह बिना अपने वृहत विषय को साधा है। आज के समय अछूतों पर लिखना भी जोखिम भरा काम हो गया है- कई तरह के आक्षेप और पूर्व निर्धारित आग्रह से परे हटना आसान नही है। इसलिए '' सफाई कामगार समुदाय`` पढ़ना सफाई कामगारों की स्थिती तथा अछूत मानलेने की मानसिकता और उनके कारणों की पड़ताल करती एक रचना से गुजरना है। लेखक ने लेखकीय निवेदन में कहा है- ''मै नही कह सकता कि प्रस्तुत विषय ( सफाई कामगार समुदाय से आशय है) की ओर साहित्य कारों का ध्यान क्यों नही गया। ऐसा हुआ होता तो मुझे कड़ी मेहनत नही करनी पड़ती। प्रयास भरपूर किया गया है कि इस कृति में दी गई जानकारी नकारात्मक अथवा भ्रामक नही हो`` संजीव की यह बात पुस्तक पढ़ने से सिध्द होती है। लेकिन लेखकों का ध्यान प्रस्तुत विषय पर जितना भी जाता कम ही होता। इस विषय पर नये-नये रूप से निरंतर लिखा जाना चाहिए।
लेखक ने पाठकों से निवेदन किया है कि ''इस पुस्तक के अध्ययन के दौरान 'सारा संसार एक कुटुम्ब है` का विचार करें तथा किसी पूर्वाग्रह बचें तभी इस कृति के साथ न्याय हो सकेगा एवं इसकी प्रासंगिकता को समझ पायेगें`` लेखक की यह ''प्रार्थना`` उनके अति विनय शीलता है। अगर वे ऐसी ''प्रार्थना`` नही भी करते तब भी उनकी कृति (सफाई कामगार समुदाय) पढ़ने पर किसी तरह अन्यथा विचार पैदा नही होता-संजीव ने कृति की रचना ही ऐसी की है- तथ्य परक और कुछ पूर्वाग्रहों तथा ''घृणा`` से बचते हुए। अत: ऐसी तथ्य परक सही विश्लेषण और दृष्टि वाली कृति पाठकों को संतोष देती है। निश्चित ही सफाई कामगार समुदाय कृति को एक खोजपूर्ण वैचारिक कृति के रूप् में ग्रहण किया जाएगा। सर पर मैला ढोना मानवीय सभ्यता की सबसे बड़ी विडम्बना है- यह खत्म की जा रही है। लेकिन ''अछूत`` सोचने का मन-विचार भी बदला जाना जरूरी है, तभी आगे जाएगा।
यह पुस्तक समीक्षा नही है- इसकी समीक्षा एक कठिन काम है। केवल कृति की चर्चा या जानकारी देना मेरा उद्देश्य है। मेरा मानना है कि इस विषय पर और भी लिखा जाना चाहिए- दर असल श्रम को सम्मान देने की सोच हमारे समाज में पैदा हो यह जरूरी है। इस अमानवीय प्रथा को समाप्त करने पूर्व में प्रयास किए गए, किए भी जा रहे है। सफाई कामगार समुदाय की आर्थिक स्थिति सुधारने इस पूंजीवादी व्यवस्था में, अपनी जरूरत पूरी करने हेतु किए गए है- लेकिन सामाजिक गैर बराबरी दूर करने के लिए समतावादी समाज की ही ज़रूरत है अन्यथा ऐसा प्रयास अपने समाजिक उत्थान के लिए किए गए कार्यों में एक और 'फूंदरा` लगा देने और उसे बार-बार बताते हुए खुद को (व्यवस्था) महिमा मंडित करने के काम ही आऐंगे।

  • प्रभाकर चौबे